Vikash Kumar

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किसी भी फिल्म में केवल नायक ही सब कुछ नही होता है बल्कि चरित्र नायक भी मायने रखते है। केवल चेहरा ही सब कुछ नहीं होता है बल्कि भाव भंगिमा भी महत्व रखती है। केवल अभिभावकों के स्टार होने से बच्चे स्टार नही हो जाते है ,आपमे दम हो तो आप भी अपनी जगह बना सकते है ये बात सीखने के लिए यदि आपको कोई मिसाल या उदाहरण चाहिए तो है ना- शोले के ठाकुर साहब बनाम संजीव कुमार। वैसे जब संजीव कुमार ने फिल्मो में अपना संघर्ष करना शुरू किया था तब एक्टिंग हाउस के प्रोडक्ट्स नही निकल रहे थे लेकिन अभिनय क्षमता रखने वालों की पूछ परख थी। कलाकारों का जमाना था जिसमे अभिनय की गुंजाइश थी ऐसे में गुजरात के हरिहर ने मुंबई का रुख किया। हरिहर से हरिभाई और फिर अटपटे नाम से संजीव कुमार के सफर में खिलौना के एक पागल ने संजीदा अभिनय का ऐसा माइल स्टोन लगाया कि जब वे विधाता में मालिक अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के नौकर अबू भाई बने तो उन्होंने खुद को नौकर होने के बजाय दिलीप कुमार को मालिक होने से इंकार करने का अभिनय नही किया था बल्कि चरित्र में जी गए थे।  ठाकुर संजीव कुमार साहब

10 Jul 2021 10:33AM,
by: Vikash Kumar