राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन का मतलब; प्रेम और विद्रोह
लेखक - संजय दुबे
काल्पनिक दुनियां में विचरना इंसान की शगल होती है।इसी बात को ध्यान में रखकर मनोरंजन के लिए फिल्मों का आविष्कार हुआ।भारत में1913से फिल्मे बनना शुरू हुई । मूक फिल्म "राजा हरिश्चंद्र" के माध्यम से दर्शकों ने पर्दे पर किरदारों को चलते देखा।1931में बोलती फिल्मों का दौर "आलम आरा" से शुरू हुआ। कालांतर में ब्लैक एंड व्हाइट के बाद रंगीन फिल्मों के दौर में अनेक नायकों ने लोगों का मनोरंजन किया। दिलीप कुमार, ट्रेजेडी किंग कहलाते थे।राज कुमार,राज कुमार, देवानंद, एक एक युग थे। बिना हाव भाव वाले राजेंद्र कुमार जिनकी 25फिल्मे लगातार सिल्वर जुबली मनाई,इसके चलते वे जुबली कुमार भी कहलाए।अर्बन हीरो देवानंद थे,जिनकी महिलाएं दीवानी हुआ करती थीं। इन सभी की दीवानगी लोगो ने देखा सुना लेकिन दो नायक ऐसे आए जिन्होंने हीरोइज़्म की परिभाषा बदल कर रख दी। ये दो नायक है राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन।
प्यार और नाराजगी व्यक्ति के दो मूल स्वभाव है। इन दोनो भाव में से एक भाव को जीना बहुत कठिन होता है लेकिन दोनों नायकों ने प्रेम और नाराजगी को साधिकार जिया।
राजेश खन्ना का दौर भले ही सात साल का था लेकिन उनके फिल्म में होने का मतलब सफलता की गारंटी थी।इसी के कारण वे घमंडी भी हुए और जितनी तेजी से सफलता की सीढ़ी चढ़े उतनी ही तेजी से नीचे गिरे। उनके अभिनय में प्रेम का भाव कूट कूट कर भरा था। आराधना ,दो रास्ते , सफर,खामोशी, कटी पतंग, सच्चा झूठा,अमर प्रेम, आनंद, अपना देश, दाग, हाथी मेरे साथी, प्रेम नगर, आपकी कसम, प्रेम कहानी फिल्म में राजेश खन्ना का स्टारडम खूब चला। राजेश खन्ना से पहले फिल्म स्टार हुआ करते थे।राजेश खन्ना के लिए "सुपर स्टार"शब्द ईजाद हुआ। राजेश खन्ना चेहरे पर भाव लाने वाले अनोखे कलाकार निकले। बड़े ही संजीदगी से मोहब्बत किया । संवाद बोलने में उनका जवाब नहीं था, प्रेम नगर का संवाद"जो ना कहे उसे छूना नहीं और जो हां कहे उसे छोड़ना मत" बेहतरीन अदायगी का प्रमाण है। उनके प्रेम की अभिव्यक्ति में मोहब्बत, एक बच्चे से लेकर बूढ़े तक पुरुष स्त्री के लिए थी। बहन ने राजेश खन्ना में भाई देखा, प्रेमिका ने प्रेमी देखा,मां बाप ने बेटा देखा ,दोस्त ने दोस्त देखा, राजेश खन्ना का अभिनय और स्टाइल देखते बना, हाफ कोट, गुरु कुर्ता, चेक रुमाल, जूते,घड़ी, कार, सभी स्टाइलिश बने। राजेश खन्ना ने जो पहना,किया सब लोगों ने अपनाया।खून से खत लिखे गए, राजेश खन्ना की फोटो,तकिए के नीचे रखे गए।गजब का स्टारडम दिखा। राजेश खन्ना के छः साल प्रेम की अभिव्यक्ति का रहा।
एक दौर वह भी देखा तो एक दौर ऐसा आया जिसमें देश का नौजवान व्यवस्था से नाराज होना शुरू किया था। 1973का समयकाल था देश में राजनैतिक स्थिरता डगमगा रही थी।चारित्रिक पतन, भ्रष्ट्राचार, जमाखोरी, का चलन शीर्ष पर था। ऐसे में फिल्म "जंजीर" आई। एक नाराज युवक की भूमिका में अमिताभ का अवतरण हुआ। "ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं" जैसे सशक्त डायलॉग ने अमिताभ को ऐसे मुकाम पर लाने की तैयारी शुरू की जिसकी चाहत हर किसी कलाकार को होती है।विजय,एक नाम ही नहीं बल्कि अव्यवस्था के विरोध में खड़ा होने वाला व्यक्तित्व बन गया। "एंग्री यंग मैन" के रूप में न मुस्कुराने वाले अमिताभ देखते देखते अगले सुपर स्टार बन गए। दीवार, काला पत्थर, जमीर, शोले,त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर, डॉन,अग्निपथ, जिस फिल्म में अमिताभ आए, गुस्से से भरे हुए। बहुत पसंद आए दर्शकों को। आम आदमी जो थाने में जाकर टेबल पर पैर रख कर बोलना चाहता था, उसके अमिताभ बच्चन प्रतिनिधि बन गए। राजेश खन्ना की तुलना में अमिताभ का दौर दो गुना रहा। 1973से लेकर 1983 तक फिल्म इंडस्ट्री में अमिताभ ही अमिताभ रहे। अमिताभ को एक और नया नाम मिला "महानायक"
सुपर स्टार राजेश खन्ना और एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ने दो फिल्मों में एक साथ काम किया आनंद और नमक हराम। आनंद केवल और केवल राजेश खन्ना की बेमिसाल अभिनय के लिए याद किया जाता है तो नमक हराम अमिताभ के लिए यादगार है। इन दोनो फिल्मों को स्टार इगो के लिए भी जाना जाता है।दोनो कलाकार के प्रशंसकों ने अपनी अपनी तरफ से ये बताने की कोशिश किया कि एक एक फिल्म में दोनों ने एक दूसरे को डोमिनेट किया।
जमाना तो गुजर गया।अमिताभ दूसरे दौर में भी सार्थक सिनेमा के पैरवीकार बने और चरित्र अभिनय में शानदार काम किया। ये काम राजेश खन्ना नहीं कर पाए जबकि चरित्र अभिनय में राजेश खन्ना ने अवतार में ठीक वैसा ही अभिनय किए थे जैसे बागबान में अमिताभ ने किया था।
दोनो ही कलाकार राजनीति में भी अपनी किस्मत आजमाए। एक दिल्ली और एक इलाहाबाद से सांसद भी बने।ये सफलता भी फिल्मी स्टारडम का था।संयोग ऐसा भी रहा कि दोनों स्टार कांग्रेस से निर्वाचित हुए थे। अमिताभ ने हेमवती नंदन बहुगुणा और राजेश खन्ना ने शत्रुघ्न सिन्हा को हराया था,
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