अधिकार की सम्पन्नता ही सजगता है...
लेखक- संजय दुबे
दुनियां भर में मानव के विरुद्ध शोषण करने वाले देशों ने ही 1948में एक सार्वभौम घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिए की । दुनियां में मानव को व्यक्तिगत भलाई के साथ साथ सामुदायिक भलाई के लिए न केवल अधिकार मिलना चाहिए बल्कि उन अधिकारों की सुरक्षा भी होना चाहिए। एशियाई और अफ्रीकी देशों को छोड़कर शेष महाद्वीपों के महत्वाकांक्षी शासकों ने सारी दुनियां में मानव के शोषण में कोई कमी नहीं की। रंग भेद भले ही कागजों में है लेकिन अभी भी गोरे वर्ण के लोगों के द्वारा भेद तो किया जा रहा है। वर्ण भेद के अलावा संपन्न देश हो या लोग इनके द्वारा विपन्न लोगो का शोषण आज भी किया जा रहा है।
अधिकार की जानकारी होना और अधिकार के उपयोग किए जाने के बीच बहुत बड़ी खाई है। कहने के लिए सर्वोच्च और उच्च न्यायालय संवैधानिक उपचार के अधिकार के संरक्षक है लेकिन महंगी न्याय व्यवस्था अधिकार की लड़ाई में आड़े आता है। अधिकार की लड़ाई के लिए न्यायधानी बार बार जाना और अधिवक्ताओं की फीस भुगतान करना आसान काम नहीं है। ऐसे में कितने सालों तक मानव अधिकार से वंचित रहेगा और शोषित होते रहेगा ,यक्ष प्रश्न है।
हर देश के संविधान में देश के नागरिकों के लिए मूलभूत अधिकार दिए जाने का उल्लेख होता है। भारतीय संविधान के भाग 3(अनुच्छेद 12से15) में नागरिकों के भौतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए समता, स्वतंत्रता,धर्म, संस्कृति शिक्षा, शोषण के विरुद्ध और संवैधानिक उपचार का अधिकार मिला हुआ हुई। इस अनुच्छेद को भारत का मैग्ना कार्टा कहा जाता है। मैग्ना कार्टा को दुनियां के लिए आम आदमी के अधिकारों की गीता का दर्जा मिला हुआ है। जो इंग्लैंड में 1217से प्रभावशील है। भारत में 26जनवरी 1950से लागू हुआ है। केशवानंद भारती वि केरल राज्य के याचिका में मूलभूत अधिकार में संशोधन का अधिकार संसद को मिला है लेकिन संविधान की मूल संरचना के विपरीत नहीं होना चाहिए।
10दिसंबर का दिन अंतराष्ट्रीय स्तर पर इसलिए मायने रखता है क्योंकि इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतराष्ट्रीय पुरस्कार और नोबल पुरस्कार का वितरण होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ में 60से अधिक व्यक्तिगत अधिकारो का उल्लेख है।
2004से हर साल मानव अधिकार दिवस के दिन एक विशिष्ट पंक्ति संरचित किया जाता है।इस साल "मेरा अधिकार, मेरा भविष्य, अभी"दिया गया है। उम्मीद की जाती है कि कागजों से निकल कर अधिकार व्यक्ति तक पहुंचेंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ,देश का संविधान बाद में मानव अधिकार के प्रति सजग होगा।व्यक्ति को अपने अधिकार के प्रति वैसे ही सजग रहना चाहिए जैसे हवाई जहाज में ऑक्सीजन मास्क दूसरों को पहनाने के बजाय खुद को पहनने की सलाह दी जाती है।
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