फिल्मी पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर से लेकर कमिश्नर याने इफ्तखार..
लेखक - संजय दुबे
दुनियां का हर इंसान काल्पनिक जीवन को फिल्मों के माध्यम से देखता है ,जीता है। जब कभी कोई फिल्म के निर्माण का काम शुरू होता है तो केवल नायक और नायिका का चयन नहीं होता बल्कि अनेक चरित्रों को जीने वालों का भी चयन होता है।
अमूनन हर फिल्म में बुराई पर अच्छाई की जीत के टैग लाइन पर बनती हैं तो बुरा व्यक्ति(खलनायक आंग्ल भाषा में विलेन) भी चयनित होता है।अपराध है तो कानून भी है इसलिए फिल्मों में पुलिस, वकील ,जज, सहित अन्य सरकारी विभाग के चरित्रों को जीने वालों को फिल्मों में लिया जाता है।
बीते जमाने की फिल्मों की बात करे तो फिल्मों में पुलिस विभाग सहित अन्य विभाग के पर्याय के रूप में अनेक चरित्र अभिनेताओ में इफ्तेखार ऐसे रहे है जिन्होंने पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर, डी एस पी, एस पी, कमिश्नर के हर पद में बेमिसाल अभिनय किया।
1938 के दौर से इफ्तेखार फिल्मों में आना शुरू कर दिए थे। शुरुआती दौर में छोटी मोटी भूमिकाओं में आते रहे लेकिन पुलिस विभाग के पदों में आने का काम अठाईस साल बाद शम्मी कपूर अभिनीत सस्पेंस थ्रिलर फिल्म "तीसरी मंजिल" में मिला। पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में इफ्तेखार को दर्शकों ने खूब पसंद किया।
फिल्मों में जिस व्यक्ति को दर्शक जिस भूमिका में पसंद कर लेती है फिर निर्माता निर्देशक उसी भूमिका में बार बार सामने आने लगते है और यही "टाइप्ड अभिनय" बन जाता है। इफ्तेखार, भी जुदा नहीं हो सके।वे फिल्मी पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर से लेकर कमिश्नर की भूमिका में जीते रहे।
पुलिस विभाग में प्रमोशन प्रक्रिया में इंस्पेक्टर के बाद डीएसपी, एडिशनल एसपी, एस पी, एडिशनल कमिश्नर, कमिश्नर के पद रहे है। आजकल डीआईजी,आईजी पद बदले हुए नामो के साथ है। सरकारी विभागों में एक बार प्रमोशन मिलने के बाद अपवाद स्वरूप डिमोशन (पद अवनति)होता है लेकिन इफ्तेखार फिल्मी पुलिस विभाग में इफ्तेखार का प्रमोशन डिमोशन साल दर साल चलता रहा। 1966 में वे "तीसरी मंजिल" में इफ्तेखार पुलिस इंस्पेक्टर बने तो 1973 में धर्मेंद्र अभिनीत फिल्म "लोफर " और 1974 में अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म "मजबूर" में आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाकर पुलिस कमिश्नर बने।1974।
में उनका डिमोशन हो गया और शत्रुघ्न सिन्हा अभिनीत फिल्म "बदला" में उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) बने।1975में उनका फिर डिमोशन "आखिरी दांव" फिल्म में हुआ और वे फिर इंस्पेक्टर बन गए।
1977 में एक बार फिर उनका आउट ऑफ टर्न प्रमोशन हुआ और "चांदी सोना" फिल्म में उन्हें पुलिस कमिश्नर बनाया गया। 1979से 1983तक झूठा कही का,दो लड़के दोनों कड़के,हादसा फिल्म में वे डिमोशन पाकर इंस्पेक्टर बने।1978 में उन्हें "डॉन" में एक बारगी डीएसपी बनाया गया। अंततः 1984में "राम तेरा देश"फिल्म में वे पुलिस कमिश्नर बने और 1989 में "गलियों के बादशाह"तक पुलिस कमिश्नर ही रहे।
इतने सारे फिल्मों में पुलिस विभाग के विभिन्न पदों काम किए लेकिन "डॉन" फिल्म में डीएसपी डिसिल्वा उनकी यादगार भूमिका रही।
इफ्तेखार,दिखने से ऐसे व्यक्तित्व के थे कि सरकारी विभाग के अनेक पदों पर वे जंचते थे। पुलिस विभाग के अलावा कोर्ट कचहरी महत्वपूर्ण अंग के रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हुआ करता है।इस कारण इफ्तेखार को विधि विभाग में वकील और न्यायधीश की भूमिका में जीने का अवसर मिला। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग में भी इफ्तेखार डॉक्टर की भूमिका में भी ऑपरेशन थियेटर के भीतर, बाहर दिखे। मेरे जानते में इफ्तेखार को "द बर्निग ट्रेन" में सबसे बड़े पर चेयरमैन, रेल्वे बोर्ड बनाया गया था।
सरकारी विभागों के किरदार के अलावा इफ्तेखार को अगर किसी अन्य भूमिका के लिए याद किया जाता है तो फिल्म "दीवार"के मुल्कराज डाबर के कारण जाना जाता है।रेसकोर्स के सामने विजय को फेके हुए पैसे उठा कर देने, और बाद में खुद भी पैसे उठाकर देने के दृश्य में इफ्तेखार का चेहरा आज भी सामने घूम जाता है।आज इफ्तेखार ने जन्म लिया था,1920में।
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