अब क्या करेंगे जस्टिस वर्मा जी!
संजय दुबे
एक मछली सारा तालाब गंदा करने लगे तो क्या करना चाहिए? बड़ा आसान सा उत्तर है मछली को तालाब से बाहर कर तालाब को साफ कर देना चाहिए........।
मगर तालाब गंदा करने वाले मछली को प्राण वायु देंगे तो तालाब बदबूदार हो जाएगा, सड़ांध फैलने लगेगी। जस्टिस वर्मा के मामले में भी यही हुआ क्योंकि उनको बचाने की अलग मजबूरी थी। सोशल मीडिया का जमाना है।
फेक अकाउंट की भरमार है। भद्दी से भद्दी टिप्पणी होगी किसी को नहीं बक्शा जाएगा। जस्टिस वर्मा भी नहीं बचे और उनके चलते न्याय पालिका पर भी सवालिया प्रश्न चिन्ह लग गए। सोचिए किसी न्यायधीश की नियुक्ति किसी राज्य में हो और उस राज्य का अधिवक्ता संघ ही बगावत कर दे तो क्या स्थिति होगी।
सरकार में एक नियम है No work No payment, बिना काम के महीनों बैठा कर वेतन दिया जाना,मजबूरी थी तो बिना काम के वेतन लेना भी कदाचित अपमान ही था। उच्च न्यायालय के न्यायधीश के घर जिसमें उनके अनुमति के कोई घर नहीं घुस सकता उनके घर के परिसर में करोड़ो रुपए के जले भारतीय मुद्रा मिले तो आचरण पर प्रश्न उठता ही है।
प्रश्न उठा भी और उत्तर भी मिला। न्यायपालिका की अपनी मर्यादा है ।न्याय की अपेक्षा करने वाला बड़ी उम्मीद से इनके चौखट पर जाता है ये जानते हुए कि तारीख पर तारीख मिलेगी।वकील, पेशी गवाही के चलते जिला से लेकर उच्चतम न्यायालय तक का सफर आसान नहीं होता। अचल संपत्ति की लड़ाई में ये माना जाता है कि बाप मामला दायर करेगा पौता न्याय पाएगा।
भ्रष्ट्राचार,मुगल काल की देन है और अंग्रेजों के द्वारा पुख्ता की गई व्यवस्था है। पहले के जमाने में वस्तु, आभूषण देने की परंपरा थी आगे चलकर मुद्रा के आ जाने के बाद आज भी विकल्प के रूप में रोजगार के बदले जमीन लिया जा रहा है। व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के लिए भ्रष्ट्राचार नया विषय नहीं है लेकिन न्याय की सीढ़ी पर भी भ्रष्ट्राचार चढ़ने लगे तो न्याय भी संदेहास्पद हो जाएगा। वर्मा जी के चलते न्यायपालिका की कार्य प्रणाली भी बदनाम हुई है।
जो संस्था भ्रष्ट्राचार के मामले में निर्णय करते हुए भ्रष्ट्राचार को नासूर, समाज के लिए कोढ़, बता कर पचास हजार के रिश्वत मामले में चार साल की सजा सुनाता है ताकि जिला न्यायालय से जमानत न मिले। जब खुद के घर से करोड़ो रुपए अधजले मिले तो समाज के लिए नासूर और कोढ़ क्यों नहीं दिखता। संविधान ने न्यायालयों के न्यायधीशों को सुरक्षा कवच पहनाया हुआ है लेकिन कानून के सामने ये भी विशिष्ट नहीं है।
कानून के सामने सभी नागरिक है ।अगर उनके कृत्य घिनौने है तो उन्हें भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जिला अदालत से जमानत याचिका निरस्त होना चाहिए।उच्च न्यायालय से साठ दिन में बाद न प्रस्तुत करने पर जमानत मिलना चाहिए। एक पटवारी को हजार पांच हजार रुपए के रिश्वत में समाचार पत्रों में सुर्खियां मिलती है।ऐसे में उच्च न्यायालय का भ्रष्ट न्यायधीश को क्यों नौकरी छोड़ने का विकल्प मिल रहा है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति ने अपना प्रतिवेदन दे दिया है। समिति ने ये प्रमाणित पाया है कि जस्टिस वर्मा के यहां साधारण तरीके से कोई नहीं घुस सकता , पैसे ले कर तो और भी।दरअसल जस्टिस वर्मा रिश्वत की पहली किश्त ले चुके थे। दूसरी किश्त के समय अंदेशा हो गया इस कारण घर से भागने और साक्ष्य को मिटाने के लिए कहानी रची गई। ये रिश्वत भी किसी मामले में उदारता दिखाने जैसे समझौते में राशि को कम करना ही होगा।
अब सच सामने है स्वाभाविक है कि जस्टिस वर्मा महाभियोग का तो सामना नहीं करेंगे।प्रश्न तो ये है कि किसी भी कोर्ट का न्यायधीश भ्रष्ट आचरण में संलिप्त पाया जाता है तो उसे नौकरी छोड़ने का विकल्प क्यों मिले उसे भी पटवारी के सामन ट्रीटमेट मिलना चाहिए।
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