बिहार चुनाव: कौन बनाएगा सरकार,जाति तय करेगी या लिंग
संजय दुबे
बिहार राज्य एक ऐसा राज्य है जहां का चुनाव अपने तरीके का अनोखा चुनाव होता है। इस राज्य में पिछले सालों से नीतीश कुमार की सरकार है, जीतन राम मांझी के कार्यकाल को छोड़कर। ये बात भी बेमानी है कि नीतीश कुमार के साथ देने वाले कौन रहे। लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के राजकाज से असंतुष्ट बिहार का जनादेश नीतीश कुमार के साथ रहा।
ये बात भी मायने रखती है कि अपराध के गढ़ के रूप में उत्तर प्रदेश के बराबर कुख्यात बिहार को नीतीश कुमार ने नये बिहार का नारा देकर बहुत हद तक दूषित वातावरण को साफ किया। बिहार में शराबबंदी लागू कर सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि में महिलाओं को पीड़ित होने से बचाने का अभियान चलाया।
नीतीश कुमार को सराहना भी मिली और साल दर साल उनका मुख्य मंत्री पद सुरक्षित रहा। नीतीश कुमार बिहार के श्री कृष्ण सिंहा, लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के समकक्ष पूरा कार्यकाल करने वाले मुख्य मंत्री रहे है। इस बार का विधान सभा चुनाव नीतीश कुमार की बड़ी परीक्षा का चुनाव है। कभी भाजपा कभी राजद के समर्थन ले कर सरकार बनाने के नाम पर उन पर आरोप लगे है।इस बार वे फिर से भाजपा के साथ है। 101-101सीट पर चुनाव लड़ रही दोनों पार्टियों ने मुख्य मंत्री का चेहरा सामने नहीं रखा है।
इस बार के चुनाव में यक्ष प्रश्न ये है कि बिहार के चुनाव का नतीजा कौन तय करेगा? माना जाता है कि बिहार में जाति का दबदबा चलता है। राजग और कांग्रेस मान कर चल रही है कि MY फॉर्मूला जातिगत तौर पर दम मरेगा। मुस्लिम और यादव एक तरफा मतदान करेंगे,ये बात सच भी है क्योंकि भाजपा जिस तरफ भी रहेगी मुस्लिम उनके विपक्ष में बहुतायत से जाएंगे।जातिगत तौर पर इस बात से इंकार नहीं है कि यादवों में लालू प्रसाद यादव परिवार का वर्चस्व है। ऐसे फायदे का दूसरा नुकसान ये भी है कि गैर मुस्लिम और यादवों से परे जातियों का ध्रुवीकरण होता है। जाति से परे दूसरा मतदाता समूह महिलाओं का है।
जो जाति से परे है लेकिन जातियों में है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान कृषि मंत्री शिव राज सिंह चौहान ने "लाडली बहना " योजना का ऐसा अकाट्य फॉर्मूला हर राजनैतिक दलों को दिया है कि "महिला वोट बैंक" अवधारणा स्थापित हो गई है। इसी के बल पर भाजपा ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़,राजस्थान के बाद महाराष्ट्र में भी सरकार बनाने में सफलता हासिल कर ली है। बिहार चुनाव के घोषणा होने के पहले 21लाख महिलाओं के खाते में दस हजार रुपए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना अंतर्गत डाले जा चुके है। राजग ने भी अपने प्रण पत्र में 2500रुपए प्रतिमाह माई बहिनी मान योजना अंतर्गत देने का प्रण लिया है।
दस हजार रुपए एक मुश्त मिलना और चुनाव के बाद पांच साल तक ढाई हजार रुपए हर महीने ,साल में तीस हजार रुपए की संभावना के बीच महिला वोटर के लिए बड़ा प्रलोभन है। इस गणित को राजग कैसे विशेष वर्ग की महिला वोटर्स को समझा पाएगी ये नतीजे बताएंगे।महिलाओं का मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव में पुरुषों के 51.11 प्रतिशत की तुलना में 3.33प्रतिशत याने 54.11 प्रतिशत था। 3करोड़ 11 लाख महिलाओं के लिए दोनों गठबंधनों ने दिल खोल कर या तो दस हजार रुपए जमा करा दिए है या ढाई हजार रुपए महीना का फ्री बीस भी परोसा है। इस खेल का दारोमदार मिल गए पैसे और मिलने वाले पैसे की बात पर विश्वास दिलाने भर की है। घर बैठे पैसे मिलना वह भी जाति नहीं लिंग के कारण मायने रखता है।महिलाएं, केंद्र में सरकार बनाने के
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