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महादेव सट्टा मामला: जांच एजेंसियों की भूमिका पर उठते सवाल
छत्तीसगढ़ का करीब 15 हजार करोड़ रुपये का महादेव सट्टा ऐप घोटाला एक बार फिर सुर्खियों में है। इस घोटाले ने न सिर्फ प्रदेश की राजनीति, बल्कि आपराधिक दुनिया में भी भारी खलबली मचा दी थी। जांच के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके करीबी माने जाने वाले कुछ वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे।
कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में वर्दी की आड़ में ऑनलाइन सट्टा संचालन को संरक्षण मिलने के आरोप लगे, और कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नाम चर्चा में रहे। सीबीआई ने कुछ अधिकारियों के ठिकानों पर छापेमारी भी की थी। अब खबर है कि महादेव सट्टा मामले की जांच पूरी हो चुकी है और इसी हफ्ते सीबीआई विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल कर सकती है।
लेकिन इसके साथ ही यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि 2001 बैच के आईपीएस आनंद छाबड़ा, 2005 बैच के शेख आरिफ और 2008 बैच के प्रशांत अग्रवाल समेत कुछ अधिकारियों को बिना ठोस जांच के लगभग क्लीन चिट दे दी गई। बताया जा रहा है कि संदिग्ध अधिकारियों की छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों में नामी-बेनामी संपत्तियों का बड़ा जाल है, लेकिन जांच एजेंसियां कथित तौर पर उस काली कमाई तक नहीं पहुंच सकीं।
सबूत मौजूद होने के बावजूद उन्हें एकत्र करने की गंभीर कोशिश नहीं हुई। हालांकि चार्जशीट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी आहट तेज हो चुकी है। इसी के साथ सरकार की मंशा और जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।
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