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जमानत पर रिहाई की आशंका मात्र निवारक हिरासत का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी की यह आशंका कि जमानत पर रिहा होने के बाद कोई व्यक्ति लोक व्यवस्था के लिए प्रतिकूल गतिविधियों में शामिल हो सकता है, निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने तेलंगाना के 1986 के ‘खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम’ कानून के तहत हिरासत में ली गई हैदराबाद की एक महिला की निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि हिरासत आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि बंदी की गतिविधियों से लोक व्यवस्था पर किस प्रकार प्रतिकूल प्रभाव पड़ा या पड़ने की ठोस आशंका थी।
पीठ ने आठ जनवरी को दिए अपने आदेश में कहा कि केवल यह अनुमान लगाना कि जमानत मिलने पर आरोपी फिर से अपराध कर सकती है, निवारक हिरासत का आधार नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तेलंगाना उच्च न्यायालय के आदेश को भी निरस्त कर दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित महिला को कानून की धारा 2(एफ) के तहत “नशीली दवाओं की तस्कर” माना गया था, लेकिन इसके बावजूद निवारक हिरासत के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों का पालन नहीं किया गया।
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