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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
आवारा कुत्तों के मुद्दे पर हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की कुछ सार्वजनिक टिप्पणियों पर कड़ी नाराज़गी जताई। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना सोचे-समझे दिए गए बयान न्यायपालिका के प्रति अवमानना के दायरे में आ सकते हैं।
पीठ ने कहा कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर वक्तव्य देते समय जिम्मेदारी और संयम आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी एक गंभीर समस्या है, जिस पर भावनात्मक बहस के बजाय ठोस और व्यावहारिक समाधान की जरूरत है।
अदालत के अनुसार, इस मुद्दे का सीधा संबंध नगर निगमों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी से है। सुनवाई के दौरान वकीलों ने दलील दी कि नगर निगमों की विफलता के कारण समय पर कचरा नहीं उठाया जाता, जिससे आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ती है।
शहरीकरण के साथ कचरे की मात्रा में इजाफा हुआ है, लेकिन उसके प्रभावी प्रबंधन में गंभीर कमी बनी हुई है। अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों की समस्या केवल मानवीय संवेदना या पशु प्रेम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और शहरी प्रबंधन की विफलता का परिणाम भी है।
नसबंदी कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित कचरा प्रबंधन नगर निगमों की मूल जिम्मेदारी है, जिसे टाला नहीं जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि इन बुनियादी दायित्वों का पालन किया जाए, तो आवारा कुत्तों से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान संभव है।
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