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रायपुर साहित्य उत्सव में समाज और सिनेमा विषय पर केंद्रित रोचक परिचर्चा में उमड़ी श्रोताओं की भीड़
रायपुर साहित्य उत्सव के अंतर्गत समाज और सिनेमा विषय पर केंद्रित परिचर्चा को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रोता अनिरुद्ध नीरव मंडप में पहुंचे, जिसमें हिंदी सिनेमाजगत के प्रसिद्ध लेखक-निर्देशक श्री अनुराग बसु, इतिहासकार-पटकथा लेखक एवं निर्माता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और सिनेमा लेखक श्री अनंत विजय ने हिस्सा लिया। परिचर्चा के सूत्रधार छत्तीसगढ़ के जाने-माने लेखक-निर्देशक श्री मनोज वर्मा रहे।
हिंदी सिनेमाजगत के निर्देशक श्री अनुराग बसु ने परिचर्चा में भाग लेते हुए सिनेमा को एक ऐसा औजार बताया, जो बिगड़े हुए समाज को शेप दे सकता है। उन्होंने कहा कि लोग रिस्क लेकर ऐसे सिनेमा बनाते हैं। अगर हम सिनेमा से सामाजिक सरोकार की अपेक्षा करते हैं, तो बहुत से लेखक-निर्देशक आज भी इस दायित्व को निभाते आ रहे हैं। श्री बसु ने कहा कि 90 के दशक में जितने सिनेमा बनते थे, आज भी उतने ही बनते हैं, बल्कि फिल्मों की संख्या और अधिक है।
आज सिनेमा के पास ज्यादा टेक्नोलॉजी है, लेकिन कहानियां भी वही हैं। अब नई कहानियां सामने आ रही हैं, नए विषयों पर फिल्में बन रही हैं। हम यदि किसी लेखक-निर्देशक की बनाई किसी फ़िल्म को अच्छा या बुरा कहते हैं, तो यह हमारा व्यक्तिगत विचार है, क्योंकि उसने पूरी ईमानदारी से फ़िल्म बनाई है और उसके हिसाब से वह फ़िल्म अच्छी बनी है। श्री बसु ने आगे कहा कि हम जब भी फ़िल्मों की बात करते हैं, तो पसंद-नापसंद की बात अपने आप ही सामने आ जाती है। उन्होंने फ़िल्मों को समाज का जरूरी हिस्सा बताया। परिचर्चा में अपने संबोधन के दौरान डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि आज फ़िल्म के हिट और फ्लॉप होने की बात अधिक होती है। सिनेमा को देखने का मापदंड बदल गया है। सिनेमा का सामाजिक सरोकार नहीं रहा। सिनेमा आपके प्रश्नों को तभी उठाएगा, जब उससे सिनेमा को बड़ा लाभ होगा। सिनेमा का दौर बदल रहा है।
श्री द्विवेदी ने कहा कि आज के समय में आप चाणक्य नहीं बना सकते। हिंदी सिनेमा में हिंदी का स्तर कहां तक पहुंचा है, यह एक बड़ी चुनौती है। सभी सिनेमा को सरल करने की बात करते हैं, हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग होता है। उन्होंने अपने अनुभव से जोड़ते हुए बताया कि बायोग्राफी भी उन्हीं पर बन रही हैं, जिनसे बड़े फायदे हों। उन्होंने उपनिषद गंगा सीरियल का उल्लेख करते हुए बताया कि उपनिषद गंगा में बहुत गंभीर काम है, जबकि चाणक्य में उस समय की सच्चाई दिखाई देती है। इस सत्र पर सिनेमा लेखक श्री अनंत विजय ने कहा कि सिनेमा कोई एलाइट माध्यम नहीं है। जब तक हम फ़िल्म नहीं देखते, तब तक चर्चा नहीं होती।
आजकल लोग फ़िल्म देखते नहीं, सिर्फ चर्चा करते हैं। प्रेम में वैज्ञानिकता नहीं ढूंढी जाती। फ़िल्मों की कहानी और पात्रों से लोग भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं। यही जुड़ाव फ़िल्मों की कॉमर्शियल और सोशल वैल्यू तय करता है।
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