हरियाणा में आरक्षण के लिए धर्मांतरण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

feature-top

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में अल्पसंख्यक आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्मांतरण के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताई है। कोर्ट ने इसे “नया किस्म का फर्जीवाड़ा” बताते हुए कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि केवल आरक्षण का लाभ पाने के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण स्वीकार्य नहीं है। इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ कर रही थी।

मामला हिसार के छात्र निखिल कुमार पुनिया से जुड़ा है, जिसने स्वयं को बौद्ध बताते हुए अल्पसंख्यक कोटे के तहत दाखिले की मांग की थी। सुनवाई के दौरान जब CJI ने याचिकाकर्ता के सामाजिक बैकग्राउंड पर सवाल किया, तो उसके वकील ने बताया कि वह जाट पुनिया समुदाय से हैं।

इस पर CJI ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आप पुनिया हैं? फिर अल्पसंख्यक कैसे हुए? मैं यह साफ़ तौर पर पूछ रहा हूं कि आप कौन से पुनिया हैं?” वकील द्वारा धर्मांतरण को मौलिक अधिकार बताने पर कोर्ट ने इसे धोखाधड़ी करार दिया और याचिका खारिज कर दी। कोर्ट यहीं नहीं रुकी। उसने राज्य में अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए हरियाणा के मुख्य सचिव से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि— अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के लिए राज्य में मौजूदा नियम और गाइडलाइंस क्या हैं? क्या सामान्य वर्ग का कोई व्यक्ति, जो EWS श्रेणी में भी नहीं आता, केवल धर्म बदलकर अल्पसंख्यक दर्जा हासिल कर सकता है?

यदि किसी छात्र ने पहले के आवेदनों में खुद को सामान्य श्रेणी बताया हो, तो क्या वह बाद में केवल लाभ के लिए खुद को बौद्ध अल्पसंख्यक घोषित कर सकता है?


feature-top