राहुल गांधी के बयान पर लेफ्ट नेताओं में गुस्सा

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राहुल गांधी के बयानों और चुनावी रणनीतियों को लेकर इंडिया गठबंधन के सहयोगी लेफ्ट (वामपंथी) दलों के नेताओं में भारी असंतोष और गुस्सा देखा गया है। मुख्य रूप से केरल और बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका और मौजूदा नेतृत्व में राहुल गांधी के तीखे रुख के कारण सीपीआई (एम) और अन्य लेफ्ट दल उनके नाकामयाब से नाराज हैं।

 केरल और बंगाल में कांग्रेस का रुखचुनावी

मुकाबला: लेफ्ट लीडर्स का मुख्य ऐतराज इस बात पर है कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लेफ्ट पार्टियों पर लगातार सीधे राजनीतिक हमले करते हैं।

गठबंधन में विरोधाभास: वामपंथियों का झुकाव है कि एक तरफ दिल्ली में साथ मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में राहुल गांधी द्वारा लेफ्ट के खिलाफ की जा रही बयानबाजी गठबंधन की एकजुटता को कमजोर करती है।

दबाव की राजनीति: हाल ही में हुई इंडिया ब्लॉक की आंतरिक बैठकों में राहुल गांधी द्वारा सहयोगी दलों को दिए गए कड़े बयानों (जैसे 'बीजेपी युग में टिकाना है तो साथ आना ही होगा') को लेकर लेफ्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है। लेफ्ट नेताओं को कांग्रेस का यह "बड़े भाई" वाला रुख और दबाव बनाने की कोशिश पसंद नहीं आ रही है।

नेतृत्व पर सवाल: गठबंधन के कुछ लेफ्ट नेताओं ने राहुल गांधी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि वे विपक्ष के उम्मीदवारों और सहयोगियों को पूरी जिम्मेदारी से नहीं ले रहे हैं।

आलोचना स्वीकारने का दावा: सहयोगियों और वाम नेताओं की इस नाराजगी और आलोचना पर राहुल गांधी ने गठबंधन की बैठक में अपनी प्रतिक्रिया भी दी थी। उन्होंने भगवान शिव का उदाहरण देते हुए कहा था कि "वे जहर पीने वाले नीलकंठ की तरह हैं" और अपने सहयोगियों द्वारा की जाने वाली हर आलोचना या अपमान को मुस्कुराते हुए सहने के लिए तैयार हैं।


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