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सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल स्टूडेंट की फीस कम करने की अर्जी पर सुनवाई से इनकार किया
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में अपनी ट्यूशन फीस कम करने की मांग करने वाले इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन (EWS) कैटेगरी के मेडिकल स्टूडेंट की अर्जी पर सुनवाई करने से मना कर दिया। अर्जी में स्टूडेंट ने अपने सोशियो-इकोनॉमिक बैकग्राउंड का हवाला दिया था। पिटीशनर ने कहा कि EWS कैटेगरी के तहत अप्लाई करने और दूसरे कॉलेजों में ऐसी सीटें होने के बावजूद उसे जनरल सीट अलॉट कर दी गई।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा, “कोई यह नहीं कह सकता कि प्राइवेट कॉलेज की फीस सरकारी कॉलेज के बराबर होनी चाहिए…हमें देश में डॉक्टरों की ज़रूरत है। अगर आप पेमेंट नहीं कर सकते, तो स्कॉलरशिप या कोई सबवेंशन स्कीम लें।”
बेंच ने समझाया कि प्राइवेट कॉलेज सेल्फ-फाइनेंसिंग इंस्टीट्यूशन हैं, जबकि सरकारी कॉलेज स्टेट-फंडेड होते हैं। इसने TMA पाई (2002) केस में सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट का ज़िक्र किया, जिसने प्राइवेट कॉलेजों को कैपिटेशन फीस लेने से रोक दिया था। “हमारे TMA पाई फैसले से, कैपिटेशन फीस पर बैन है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सेल्फ-फाइनेंसिंग इंस्टीट्यूशन अपनी जनरल कॉलेज फीस नहीं ले सकते।”
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