रायगढ़ : मेडिकल कॉलेज रोड के बरसाती नाले पर केलो नदी की तर्ज पर पुल का निर्माण

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मेडिकल कॉलेज रोड के बरसाती नाले पर केलो नदी की तर्ज पर पुल का निर्माण

 

रायगढ़। इसमें कोई शक नहीं है की रायगढ़ में विकास कार्य बहुत तेजी से चल रहे हैं जो प्रशंसनीय हैं।  मेडिकल कॉलेज जैसे मार्ग को चौड़ा किया जाना भी आवश्यक है परंतु इस मार्ग पर एक बरसाती नाला है जिसमें बालसमुंद में एकत्रित बारिश के अतिरिक्त जल भराव को छोड़ा जाता है जहां से बहते हुए लाल मैदान के पीछे से फॉरेस्ट के गुलाब गार्डन और कई कॉलोनी के बीच से होते हुए यह आगे बढ़ता है और फिर जाकर केलो नदी में समाहित होता है।

 

  इस बरसाती नाले की कुल चौड़ाई प्रत्येक स्थान पर परिस्थितियों के अनुसार कहीं 36 फुट तो कहीं 55  फुट  तक है जो कि राजस्व के नक्शे में दर्ज है। हो सकता है तकनीकी तौर पर एक दो फुट का और अंतर आ जाए, अब प्रश्न यह उठता है कि यदि इस मार्ग को फोरलेन  बनाया जा रहा है तो चौड़ाई 80 फुट के आसपास होती है लेकिन पुल की चौड़ाई मात्र 59  फुट ही रखी गई है । टीवी टावर रोड से मेडिकल कॉलेज तक 80 फुट के मार्ग पर जो पुल बनेगा वह 59 फुट का ही बनेगा यानि दोनों तरफ 10-10 फुट कम चौड़ाई रहेगी । अब हम इसके दूसरे पहलू पर चलते हैं  हर पुल की जितनी ऊंचाई होती है उसी के अनुसार के दोनों भुजाओं  की तरफ का मार्ग उसी अनुपात में ऊंचा किया जाता है ताकि सीधी चढ़ाई ना चढ़नी पड़े और पैदल रिक्शा साइकिल वालों को भी यह मार्ग उपयोग करने में आसानी हो।

 

परंतु जैसा कि रायगढ़ में परंपरागत तरीके से हर मार्ग पर जहां भी पुल बनाए जाते हैं वहां सीधी चढ़ाई चढ़ते हुए पुल को ऊंचा किया जाता है और फिर उतनी ही तेजी से सीधी ढाल बनाते हुए नीचे की ओर ले जाया जाता है।  जैसा कि आप रामनिवास टॉकीज रोड और कोतरा रोड में भी देख रहे हैं यह रायगढ़ की स्पेशल इंजीनियरिंग है ऐसा बाकी जगहों पर कम ही देखने को मिलता है।  इस मार्ग पर भी उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए  इस बरसाती नाले की ऊंचाई भूतल पर पानी की अंतिम गहराई से लगभग 60 फुट ऊंचा और इसकी वर्तमान चौड़ाई जो कि राजस्व नक्शे  के अनुसार लगभग 55 फुट है उसको सीधे 216 फुट तक चौड़ा  बनाया जा रहा है जिसके नीचे 70-70 फुट के दूरी पर तीन पिलर भी लगाए जाएंगे और जब इस मार्ग को उठाया जाएगा तो इसमें लगभग 18 से 20 फुट का भराव किया जाएगा और काफी दूर से इसे उठाया जाएगा ।

 

अब यहां प्रश्न यह उठता है कि इस छोटे से बरसाती नाले पर नदी की तर्ज पर ईतना बड़ा पुल बनाने की आवश्यकता क्यों है ? यदि बरसाती नाले पर मजबूत से मजबूत पुल बनाया जाए तो भी चंद लाख का ही खर्च आएगा लेकिन इसे करोड़ों  का बजट बना दिया गया है।  जिनकी जमीन अधिग्रहित होगी उनकी बची हुई जमीन लगभग 20 फीट गहरे गड्ढे में चली जायेगी  जिसे भरवाने में करोड़ों रुपए की मिट्टी और श्रम लगेगा अन्यथा वह जमीन है केवल कृषि कार्य के लिए ही उपयोगी होगी वह भी एक गहरी खाई की तरह आज मेडिकल कॉलेज रोड और मेडिकल कॉलेज के आसपास का इलाका कमर्शियल बेल्ट बनता जा रहा है और यह होता भी है।

 

 मेडिकल कॉलेज के आसपास आने वालों के लिए बहुत सारी सुविधाएं बनानी पड़ती हैं इंफ्रास्ट्रक्चर निर्मित होता है पर सेतु निगम कि ड्राइंग डिजाईन से  शासन का न केवल करोड़ों रुपए खर्च हो रहा है बल्कि आम जनता को भी करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है। इसकी ऊंचाई बढ़ाने की आवश्यकता नहीं होने के बाद भी ऊंचाई बढ़ाई जा रही है। बड़े अतरमुडा गांव को आधा भाग निगम क्षेत्र में माना जाता है और आधा ग्रामीण क्षेत्र में माना जाता है यह भी एक जादू है। अब जो क्षेत्र ग्रामीण माना जाता है वहां पर भी यदि आप कॉलोनी का निर्माण करते हैं तो आपकी जमीनी स्क्वायर फीट दर पर रजिस्ट्री होगी और आपको नगर निगम के नियम फॉलो करना पड़ेगा, वर्तमान में इसी इलाके में मेडिकल कॉलेज के आसपास तीन-चार कालोनियां विकसित हो रही है जिसमें से एक तो विकसित हो चुकी जिसमें सारे नगर निगम के कानून काम करते हैं जबकि वह नगर निगम का क्षेत्र है ही नहीं वह ग्रामीण क्षेत्र में है लेकिन उस पर नगर निगम के अनुसार सारे टैक्स लग रहे हैं और उसी अनुसार विकसित भूमि का पंजीयन शुल्क वसूल किया जाता है।  स्क्वायर फुट की दर से रजिस्ट्री होती है लेकिन जब अधिग्रहित भूमि का मुआवजा गणना की जाएगी तो उसमें हेक्टेयर दर लागू होगा और ग्रामीण क्षेत्र कहलाया जाएगा।  प्रशासन अपनी इस दोहरी नीति के कारण जबरदस्ती एक कॉन्ट्रोवर्सी पैदा कर रहा है।

 

अब जब यह भूमि अधिग्रहित हो जाएगी और इसका मुआवजा दे दिया जाएगा तो उसके तुरंत बाद चुनावी परिसीमन के कारण  सारी भूमि इस गांव की और इसके आगे की गांव की भी नगर निगम क्षेत्र में आ जाएगी।  क्या यह किसानों के प्रति अन्याय नहीं है? क्या यह उन भूमि मालिकों के प्रति अन्याय नहीं है जिनकी जमीन अनिवार्य अधिग्रहण में ली जा रही है और उन्हें कम मुआवजा मिल रहा है । भूअधिग्रहण कानून  पूरा पारदर्शी कानून है उसके बाद भी इस तरीके का व्यवहार करना और उन्हें एक लंबे कानूनी दांव पेच में फंसाए रखना इससे किसी को क्या हासिल हो जाएगा यह समझ से परे है ।

 

 यह मुद्दा जब भी उठेगा तो बातें दूर तलक जायेंगी  कि आखिर इस छोटे से बरसाती नाले पर इतना बड़ा पुल बनाने की क्या आवश्यकता थी। 


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