‘घर वापसी’ से नहीं बचेगी सदस्यता, दानम नागेंदर की याचिका SC ने की खारिज

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सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के विधायक दानम नागेंदर की याचिका को खारिज करते हुए दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि किसी विधायक की अपनी मूल पार्टी में दोबारा वापसी या "घर वापसी" उसे दल-बदल के कानूनी परिणामों से बचा सकती है।

नेताओं द्वारा बार-बार पाला बदलने की राजनीति पर तंज कसते हुए शीर्ष अदालत ने इस मामले को भारतीय राजनीति के प्रसिद्ध मुहावरे "आया राम, गया राम, फिर आया राम" का एक सटीक उदाहरण बताया।

"घर वापसी" पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

नागेंदर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी थी कि दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(b) के तहत यदि राजनीतिक दल अपने सदस्य के आचरण को माफ कर देता है, तो उसकी सदस्यता बच जानी चाहिए। उनका तर्क था कि बीआरएस में वापसी के बाद अयोग्यता की कार्रवाई का कोई आधार नहीं बचता।

अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "आपकी घर वापसी आपको कैसे बचा सकती है? जैसे ही आपने दल-बदल का कृत्य किया, आप सदन (विधानसभा) की सदस्यता खो देते हैं।"


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