आरक्षण की 50% सीमा पर कानूनी टकराव, राज्यों की नीतियों की संवैधानिक कसौटी पर जांच

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देश के विभिन्न राज्यों द्वारा जातिगत और संस्थागत आरक्षण का दायरा बढ़ाने के प्रयासों को अदालतों में कड़ी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे सुप्रीम कोर्ट और कई उच्च न्यायालयों में एक बड़ा कानूनी टकराव खड़ा हो गया है। वर्ष 1992 के ऐतिहासिक 'इंद्रा साहनी' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा को पार करने के राज्यों के प्रयासों को न्यायपालिका संवैधानिक मापदंडों की कसौटी पर कस रही है। अदालतें स्पष्ट कर रही हैं कि आरक्षण बढ़ाने के लिए राज्यों के पास ठोस अनुभवजन्य आंकड़े, प्रशासनिक दक्षता की रक्षा और पिछड़ेपन के पुख्ता प्रमाण होने अनिवार्य हैं, जिन्हें राजनीतिक लाभ के लिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


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