- Home
- DPR Chhattisgarh
- रायपुर
- विश्व धरोहर बनने की ओर सिरपुर का ऐतिहासिक कदम, यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल हुई छत्तीसगढ़ की प्राचीन सांस्कृतिक नगरी
विश्व धरोहर बनने की ओर सिरपुर का ऐतिहासिक कदम, यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल हुई छत्तीसगढ़ की प्राचीन सांस्कृतिक नगरी
- मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक धरोहरों को मिल रही वैश्विक पहचान
- पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल के प्रयासों से प्रदेश की समृद्ध विरासत के संरक्षण, संवर्धन और पर्यटन विकास को मिलेगी नई दिशा
- महानदी के तट पर बसी प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर अब विश्व पर्यटन मानचित्र पर बनाएगी विशिष्ट पहचान
- लक्ष्मण मंदिर, बौद्ध विहार, सुरंग टीला और अद्भुत स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध सिरपुर में समाहित है लगभग डेढ़ हजार वर्षों का गौरवशाली इतिहास
छत्तीसगढ़ की गौरवशाली ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। महासमुंद जिले में पुण्य सलिला महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगरी सिरपुर को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तिकला, स्थापत्य वैभव और धार्मिक सहिष्णुता की अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध सिरपुर अब विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में प्रदेश के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों को वैश्विक पहचान दिलाने तथा सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाओं को विस्तार देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सिरपुर का यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना इसी दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इस उपलब्धि से सिरपुर की ऐतिहासिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने तथा भविष्य में पर्यटन गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं मजबूत होंगी।
केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने किया था सिरपुर का निरीक्षण
उल्लेखनीय है कि केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थलों का अवलोकन किया था। इस दौरान उन्होंने सिरपुर की समृद्ध विरासत, प्राचीन स्मारकों और स्थापत्य कला की सराहना करते हुए इनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए आवश्यक कार्य किए जाने तथा सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्राथमिकता से प्रयास करने की बात कही थी।
दक्षिण कोसल की राजधानी रहा सिरपुर, धर्म और संस्कृति का प्राचीन केंद्र
सिरपुर का इतिहास भारतीय सभ्यता, धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक समन्वय और स्थापत्य कला की अद्भुत विरासत को समेटे हुए है। प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से विख्यात यह नगर पाण्डुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के तट पर स्थित यह नगर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।
सिरपुर की प्राचीनता के महत्वपूर्ण प्रमाण शरभपुरीय शासकों प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से प्राप्त होते हैं। पाण्डुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के लगभग 57 वर्षों के दीर्घ शासनकाल में सिरपुर ने सांस्कृतिक और स्थापत्य विकास की नई ऊंचाइयों को प्राप्त किया। इस काल में अनेक मंदिरों, बौद्ध विहारों, सरोवरों तथा उद्यानों का निर्माण हुआ।
सातवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरणों में यहां बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है। उस काल में इस क्षेत्र में लगभग 100 बौद्ध संघाराम तथा महायान परंपरा के लगभग 10 हजार भिक्षुओं की उपस्थिति का वर्णन मिलता है।
सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषता यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धार्मिक परंपराओं का सहअस्तित्व है। स्वयं शैव मत के अनुयायी होने के बावजूद महाशिवगुप्त बालार्जुन ने बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक दान देकर संरक्षण प्रदान किया। यह तथ्य सिरपुर को प्राचीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करता है।
लक्ष्मण मंदिर : प्राचीन भारतीय ईंट स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण
सिरपुर का विश्वप्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्ट उपलब्धियों में गिना जाता है। लगभग सातवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर ईंटों से बने प्राचीन भारतीय मंदिरों के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से एक है। मंदिर की भव्यता, कलात्मक अलंकरण, सूक्ष्म शिल्पांकन और निर्माण तकनीक तत्कालीन शिल्पकारों की अद्भुत प्रतिभा को प्रदर्शित करती है।
लगभग सात फुट ऊंची पाषाण निर्मित जगती पर स्थित यह पंचरथ शैली का मंदिर गर्भगृह, अंतराल और मंडप से युक्त है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर चैत्य गवाक्ष, गज, कीर्तिमुख, भारवाहक गण तथा विभिन्न अलंकरणात्मक आकृतियां अंकित हैं।
मंदिर का प्रवेश द्वार विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र है। इसके शीर्ष भाग में शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा तथा द्वार शाखाओं पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों, कृष्ण लीला और अन्य पौराणिक प्रसंगों का सुंदर अंकन किया गया है। गर्भगृह में नागराज शेष की प्रतिमा स्थापित है।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार लक्ष्मण मंदिर का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। रानी वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मन की पुत्री थीं। इस मंदिर का निर्माणकाल लगभग 650 ईस्वी माना जाता है। यह मंदिर आज भी सिरपुर की स्थापत्य प्रतिभा और सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत प्रतीक है।
गंधेश्वर महादेव मंदिर : महानदी के तट पर आस्था और इतिहास का संगम
महानदी के पवित्र तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर सिरपुर की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। प्राचीन काल में गंधर्वेश्वर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख स्थल बना हुआ है।
इस मंदिर के निर्माण में प्राचीन मंदिरों एवं बौद्ध विहारों से प्राप्त स्थापत्य खंडों का उपयोग किया गया है। मंदिर परिसर में अनेक कलात्मक प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष संरक्षित हैं। यहां उपलब्ध शिल्पांकन तत्कालीन कला परंपरा, पौराणिक कथाओं और धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा सिरपुर, विहारों में दिखाई देती है अद्भुत निर्माण कला
सिरपुर प्राचीन भारत में महायान बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां किए गए पुरातात्विक उत्खनन में अनेक बौद्ध विहारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इन विहारों में ध्यान, अध्ययन, अध्यापन और भिक्षुओं के निवास की सुव्यवस्थित व्यवस्था थी।
सिरपुर के प्रमुख बौद्ध विहारों में आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वास्तिक विहार विशेष उल्लेखनीय हैं। आनंदप्रभु कुटी विहार का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में आनंदप्रभु नामक बौद्ध भिक्षु द्वारा कराया गया था। अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर इस विहार की पहचान की गई है।
इस विहार में भिक्षुओं के निवास के लिए 14 कक्ष थे तथा यह दो मंजिला संरचना थी। विहार के मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में लगभग साढ़े छह फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। यहां अवलोकितेश्वर सहित अन्य बौद्ध प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं।
इसके समीप स्थित स्वास्तिक विहार अपनी विशिष्ट तल योजना के कारण प्रसिद्ध है। यहां भी भूमिस्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इन विहारों के अवशेष प्राचीन सिरपुर की धार्मिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
तीवरदेव महाविहार : प्राचीन दक्षिण कोसल की बौद्ध स्थापत्य विरासत का भव्य प्रमाण
सिरपुर में वर्ष 2002-03 के दौरान डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन में विशाल तीवरदेव महाविहार के अवशेष प्राप्त हुए। लगभग 902 वर्गमीटर क्षेत्र में निर्मित यह महाविहार दक्षिण कोसल के प्रमुख बौद्ध स्थापत्य स्थलों में शामिल है।
लक्ष्मण मंदिर से लगभग एक किलोमीटर पूर्व कसडोल मार्ग पर स्थित यह महाविहार अपनी विशालता, अलंकृत प्रवेश द्वार और अद्भुत शिल्पकला के लिए विशेष महत्व रखता है।
महाविहार के प्रवेश द्वार पर पशु आकृतियों, पंचतंत्र की कथाओं, तत्कालीन सामाजिक जीवन और विभिन्न कलात्मक प्रसंगों का सूक्ष्म अंकन मिलता है। यहां मगरमच्छ और वानर की प्रसिद्ध कथा, पशुओं से संबंधित दृश्य तथा अन्य अलंकरण तत्कालीन कलाकारों की कल्पनाशीलता और शिल्प दक्षता को प्रदर्शित करते हैं।
विहार परिसर में जल निकासी के लिए भूमिगत पत्थर की नालियों तथा सुव्यवस्थित कक्षों के अवशेष भी मिले हैं। यह प्राचीन काल की विकसित निर्माण तकनीक और नगर नियोजन की जानकारी प्रदान करता है।
सुरंग टीला और राम मंदिर : स्थापत्य वैभव के महत्वपूर्ण साक्ष्य
सिरपुर का सुरंग टीला भी अपनी विशिष्ट संरचना और प्राचीन मंदिर स्थापत्य के कारण महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां प्राप्त मंदिर अवशेष, सीढ़ियां और शिल्पांकन तत्कालीन धार्मिक एवं स्थापत्य परंपराओं की जानकारी प्रदान करते हैं।
इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर के पूर्व दिशा में स्थित प्राचीन राम मंदिर भी ईंटों से निर्मित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संरचना है। वर्तमान में इसका शिखर नष्ट हो चुका है तथा मंदिर की दीवारों के अवशेष शेष हैं। इसकी ताराकृति योजना और विशिष्ट निर्माण शैली इसे पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। लक्ष्मण मंदिर और राम मंदिर के निर्माणकाल में कुछ दशकों का अंतर माना जाता है।
दो हजार से अधिक पुरावशेषों ने खोले सिरपुर के गौरवशाली अतीत के रहस्य
सिरपुर में विभिन्न चरणों में किए गए पुरातात्विक उत्खननों ने इस प्राचीन नगरी के समृद्ध इतिहास की अनेक परतों को उजागर किया है। उत्खनन के दौरान दो हजार से अधिक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।
इनमें धातु प्रतिमाएं, प्रतिमा फलक, आभूषण निर्माण के उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, जंजीर, दीपक, पूजा पात्र, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, पकी मिट्टी की मुहरें, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं।
विशेष रूप से यहां प्राप्त एक चीनी सिक्का ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे चीनी सम्राट काई युवान के काल से संबंधित माना गया है। इसके अतिरिक्त शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र तथा कलचुरी शासक रत्नदेव के काल से संबंधित सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। ये पुरावशेष सिरपुर के प्राचीन व्यापारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्कों की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
सातवीं-आठवीं शताब्दी में धातु मूर्तिकला का प्रसिद्ध केंद्र था सिरपुर
सिरपुर सातवीं और आठवीं शताब्दी के दौरान उत्कृष्ट धातु प्रतिमाओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां निर्मित प्रतिमाएं भारतीय धातु मूर्तिकला की उच्च परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
वर्ष 1939 में सिरपुर से धातु प्रतिमाओं का महत्वपूर्ण भंडार प्राप्त हुआ था। इनमें भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा, ऋषभनाथ और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं प्रमुख हैं।
इन प्रतिमाओं की मुखाकृति, नेत्रों की भावभंगिमा, हस्त मुद्राएं, वस्त्रों की तरंगवत सिलवटें और सूक्ष्म अलंकरण अद्भुत कलात्मक कौशल के परिचायक हैं।
सिरपुर से प्राप्त अनेक धातु प्रतिमाएं रायपुर, नागपुर, नई दिल्ली और मुंबई के संग्रहालयों एवं संस्थानों में संरक्षित हैं। इन कलाकृतियों का प्रदर्शन इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में भी किया जा चुका है। यह सिरपुर की कला परंपरा की अंतरराष्ट्रीय महत्ता को रेखांकित करता है।
पुरातात्विक संग्रहालय में संरक्षित है सिरपुर की अमूल्य विरासत
लक्ष्मण मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा स्थापित संग्रहालय सिरपुर की प्राचीन कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां उत्खनन से प्राप्त शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से संबंधित दुर्लभ प्रतिमाएं एवं स्थापत्य खंड संरक्षित हैं।
संग्रहालय में चतुर्मुख शिवलिंग, महिषासुरमर्दिनी, नृसिंह, अंबिका, चामुंडा, विष्णु, सूर्य, मातृका, जैन तीर्थंकर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इनके अतिरिक्त केशीवध का दृश्य प्रदर्शित करने वाली प्रतिमा तथा नायिका की कलात्मक मूर्ति तत्कालीन शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं। इन प्रतिमाओं में सौंदर्य, आध्यात्मिकता और शिल्प कौशल का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
राजमहल के अवशेषों से सामने आई प्राचीन नगरी की भव्यता
सिरपुर में महानदी के तट के समीप वर्ष 2000-01 के दौरान डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन में एक विशाल परिसर के अवशेष प्राप्त हुए थे, जिन्हें राजमहल के अवशेषों के रूप में पहचाना गया।
यहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की महत्वपूर्ण प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं। इन अवशेषों से प्राचीन सिरपुर की राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक समृद्धि की जानकारी मिलती है।
वर्ष 2001 से 2004 के बीच हुए विभिन्न उत्खननों में अनेक मंदिरों, बौद्ध विहारों और अन्य संरचनाओं के अवशेष सामने आए, जिन्होंने सिरपुर के ऐतिहासिक महत्व को और अधिक स्थापित किया।
वैश्विक पहचान से सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई गति
सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में स्थान मिलने से छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक पर्यटन की संभावनाओं को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
सिरपुर की वैश्विक पहचान मजबूत होने से देश-विदेश के पर्यटकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का आकर्षण बढ़ सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर पर्यटन सेवाओं, होटल, होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन और अन्य रोजगारमूलक गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
विशेष रूप से सिरपुर की बौद्ध विरासत अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन परिपथ से जुड़ने की महत्वपूर्ण क्षमता रखती है। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं का ऐतिहासिक संगम धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को विशिष्ट पहचान प्रदान कर सकता है।
विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव
यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना किसी ऐतिहासिक स्थल को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरण है। इसके बाद निर्धारित मानकों के अनुरूप विस्तृत नामांकन दस्तावेज, संरक्षण प्रबंधन व्यवस्था और मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
सिरपुर की समृद्ध पुरातात्विक विरासत, अद्वितीय ईंट स्थापत्य कला, प्राचीन बौद्ध विहार, दुर्लभ मूर्तियां तथा विभिन्न धार्मिक परंपराओं के ऐतिहासिक सहअस्तित्व की विशेषताएं इसे वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
सिरपुर की यह उपलब्धि केवल एक पुरातात्विक स्थल की पहचान का विषय नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की हजारों वर्षों से विकसित होती सांस्कृतिक चेतना, कलात्मक प्रतिभा, धार्मिक सद्भाव और ऐतिहासिक गौरव को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
महानदी के तट पर सदियों से इतिहास की अमूल्य धरोहरों को संजोए सिरपुर अब अपनी प्राचीन सांस्कृतिक आभा के साथ वैश्विक पहचान की नई यात्रा पर अग्रसर है। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत को विश्व के सामने प्रस्तुत करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य विरासत के संरक्षण का संदेश भी देती है।
About Babuaa
Categories
Contact
0771 403 1313
786 9098 330
babuaa.com@gmail.com
Baijnath Para, Raipur
© Copyright 2019 Babuaa.com All Rights Reserved. Design by: TWS
- ज़रा हटके
- टॉप न्यूज़
- एंटरटेनमेंट
- लाइफस्टाइल
- विचार
- ऐतिहासिक
- खेल
- राजनीति
- देश-विदेश
- फोटोज़
- वीडियोस
- लेख
- संपादक की पसंद
- Research
- DPR Chhattisgarh
- West Bengal Election Result Update
- Assam Election Result Update
- Tamilnadu Election Result Update
- Kerala Election Result Update
- Puducherry Election Result Update
- राज्य
