आज "हिंदी पत्रकारिता दिवस", जुगल किशोर शुक्ल और हिंदी पत्रकारिता की शुरुवात
लेखक - संजय दुबे
इस देश मे संस्कृत से देवनागरी लिपि के सफर में अनेकानेक भाषाओं ने लिखने बोलने की विधि का अविष्कार किया लेकिन तमाम भाषाओं की पछाड़ते हुए हिंदी ने अपना बहुमत बना ही लिया। यद्यपि देश के संविधान में देश की भाषा के मामले में संविधान विदों की बोलती बंद हो गयी थी - राष्ट्र भाषा के चयन में। अंग्रेजी को सीख विदेशी नकल की अंधभक्ति ने हमे गुलाम मानसिकता में जकड़ने सर्वश्रेष्ठ कार्य किया लेकिन हिंदी ने अपना वजूद बनाये रखा। हिंदी को हिंदी के कलमकारों ने एक तरफ सींच कर विराट बनाया तो हिंदी भाषी फिल्मो औऱ बाद में टेक्नालॉजी के बने 4 केंद्रों(पुणे,बंगलूरू, चैन्नई, हैदराबाद), में हिंदी भाषियों के बढ़ती जनसंख्या ने समीकरण बदल कर रख दिया है। आज देश मे समग्र 45 फिसदी आबादी याने 60 करोड़ लोग हिंदी पढ़ते बोलते है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ने देश मे भाषा की बेड़ियों को तोड़ते हुए लोगो को हिंदी से जुड़ने के लिए विवश किया। हिंदी को स्थापित और प्रतिष्ठित करने में हिंदी समाचार पत्रों के पत्रकारों के योगदान को आज याद करने का दिन है क्योंकि आज के ही दिन जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी के पहले समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड को कोलकाता में जन्म दिया था। अंग्रेजो के शासनकाल में जब कोलकाता देश की राजधानी हुआ करती थी। यहां से पारसी और आंग्ल भाषा मे समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे। जुगल किशोर शुक्ल जो मूलतः उत्तरप्रदेश के रहनेवाले थे। उन्होंने जुगत लगाया और अपने सामर्थ्य का इम्तिहान खुद लिया। 30 मई 1826 को जब जुगलकिशोर जी ने पहला अंक निकाला तो लिखा " यह उदंत मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नही चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगला में जो समाचार पत्र कागज छपता है उनका सुख बोलियों को जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। बाकी लोग पराए सुख पर सुखी होते है जैसे पराए सेठ का धनी होना और अपने रहते पराई आंख से देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसका रस मिलना कठिन है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे है अब हिंदुस्तानी लोग देख ले । आप पढ़ ले समझ ले। पराई मि उपेक्षा न करे पर अपनी भाषा का मान न छोड़े।"
जुगलकिशोर जी ने 12×8 इंच लंबे चौड़े आकार में उदंत मार्तण्ड का 79 अंक निकाला। तब के जमाने मे बंगला भाषा के वर्चस्व में हिंदी का जमाना कठिन था। हिंदी भाषी होने के कारण विज्ञापन मिलना कठिन था। पाठक तक भेजने के लिए डाक शुल्क में रियायत भी नही मिली सो हर मंगलवार को निकलने वाला उदंत मार्तण्ड का जब अंतिम 79 वा अंक निकला तो जुगलकिशोर जी ने लिखा
आज दिवस लो उग चुक्यो मार्त्तण्ड उदंत
अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत
हिंदी पत्रकारिता का ये बुनियादी दौर था। 195 साल गुजर गए है पत्रकारिता, आजादी की लंबी लड़ाई में जब तोप मुकाबिल नही था तब कलम निकाल कर लड़ाई लड़ा। गरीबी, भुखमरी के खिलाफ युद्ध किया। आपातकाल में खामोश हुआ ।आगे के दौर में विज्ञापन का सहभागी बना और कुछ समय से चौथे स्तम्भ के ऊपर व्यवस्थापिका औऱ कार्यपालिका का दबाव बढ़ते जा रहा है।इसे लोग सेठ या मीडिया हाउस का सत्ता से गलबहियां भी मानते है इस कारण अवमूल्यन भी हो रहा है। प्रेस के भीतर ही शोषण के खिलाफत करने वाले कलमकारों का शोषण कर रहे है। ये आज के दिन का सवाल है जुगलकिशोर जी की तरफ से
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