"भारत में मौजूदा महंगाई और बेरोज़गारी मुख्यतः सरकारी निकम्मेपन का नतीजा है"- डॉक्टर चयनिका उनियाल
आज देश में महंगाई और बेरोज़गारी और चरम पर है। ससंद में दिए गए सरकारी आँकड़े बेरोजगारी की भयावह स्तिथि को चीख चीख कर बता रहें हैं । अक्टूबर 2022 में देश भर में बेरोजगारी दर 7.8 % पहुँच गई | आंकड़ो अनुसार सबसे अधिक बेरोजगारी भाजपा शासित राज्य हरियाणा में और सबसे कम बेरोजगारी कोंग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ में है | 8 वर्षों में 22 करोड़ युवाओं ने केंद्रीय विभागों में नौकरी के लिए आवेदन दिया, जिसमें से मात्र 7 लाख को रोजगार मिल सका है, वो भी जब देश में लगभग एक करोड़ स्वीकृत पद खाली हैं और इस स्थिति में भाजपा सरकार हाथ पर हाथ धरकर बैठी है । देश में रोजगार पैदा करने की दर 20.9% से घटकर 10.4% रह गयी है, यह पिछले 5 वर्षों में सबसे न्यूनतम स्तर पर है।
महंगाई पिछले आठ सालों में अपनी सबसे ऊंची दर पर है। देश में मंहगाई दर सितम्बर माह में 7.4% तक पंहुच चुकी है। भूखमरी सूचकांक में देश 107 नम्बर पर पहुंच गया। दूसरी ओर डॉलर की तुलना में रुपए में तेज़ गिरावट जारी है। आज डॉलर की तुलना में रुपया गिर कर 80 के स्तर को पार कर चुका है। डॉलर महंगा होने से भारत का आयात और महंगा होता जा रहा है और इससे घरेलू बाजार में चीजों के दाम भी बढ़ रहे हैं। ऐसी परीस्तिथि में अवसाद ग्रस्त हो कर देश में आत्महत्या करने वालों का आंकड़ा भी 2021 में 1.64 लाख पहुंच गया।
भारत में खुदरा महंगाई की दर 7 फीसदी है और यह लगातार आठ महीने से रिजर्व बैंक के 6 फीसदी के अपर लिमिट से ऊपर है। सरकारी आंकड़ो के अनुसार पिछले पांच सालों में 4.13 करोड़ लोग LPG की सिंगल रीफ़िल का खर्च नहीं उठा सके, जबकि 7.67 करोड़ने इसे केवल एक बार रीफ़िल किया। घरेलू गैस की बढ़ती कीमतें और सब्सिडी समाप्ति के साथ गरीबों के 'उज्जवला के चूल्हे' बुझ रहे हैं। “स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन” देने के वादे खोखले व हवाई सिद्ध हुए हैं। रेलवे- स्टेशन में बुजुर्गों की दी जाने वाली सब्सिडी बंद हुई, रेलव प्लेटफार्म टिकट कई गुना महंगे हुए तथा घरेलु फ्लाईटस कि टिकटों की कीमत दुगनी हो चुकी है |
दैनिक उपभोग की वस्तुओ की दाम उची चलांगे लगा कर नित नये रिकोर्ड बनाने में लगे है पिछले 1 साल में महगाई चरम पर है, जिससे लोगो के घरो का बजट बिगड़ रहा है | जहा देश भर में पेट्रो उत्पादों और गेस के बढ़ते दाम रुकने का नाम नहीं ले रहे है, वही आंकडे यह भी दिखाते है की पिछले 3 सालो में सभी सामानों की कीमत में 30% से 40% तक की वृध्धि हुई है | पिछले 1 साल में खाध्य पदार्थो के दाम दुगने हो चुके है | चारे की महंगाई दर 25% से उपर बनी हुई है | महेंगे चारे व GST के कारण दूध के दाम लगातार बढ़ रहे है उदहारण के लिये मदर डेयरी के दूध की कीमत पिछले 1 साल में 7 रु. बढ़ी है |
यह भी जानना दिलचस्प होगा कि इस निकम्मी सरकार के वित्तमंत्रालय का बयान है "उपभोग सम्बन्धी तथ्य बताते हैं कि भारत में मुद्रास्फीति का उच्च आय वाले समूहों की तुलना में निम्न आय वर्ग पर कम प्रभाव पड़ता है|" लगता है (ये दुष्ट नया अर्थशास्त्र पढ़ाएंगे कि आटा, दाल, सब्जी आदि और चीज़ों के मुकाबले महंगी हैं तो गरीब कम प्रभावित होगा | (क्योंकि यदि खुदरा महंगाई कि दर से आटा, दाल, सब्जी महंगे हैं तो खुदरा महंगाई में शामिल किये जाने वाली और चीज़ें सस्ती होंगी तभी खुदरा महंगाई कि दर कम रह सकती है)| ऐसा झूठ सरकार खुल्लम खुल्ला बोल रही है यह इस बात का सबूत है कि सरकार बेशर्मी की सभी हदें पार करने को तैयार है।
इस बदहाली के लिए जिम्मेदार वर्तमान भाजपा सरकार की नीतियां रही हैं इस पर मीडिया में कोई बहस नहीं है। सरकार ने ईंधन टैक्स के जरिये आम आदमी की जेब से अरबों रूपया लूटकर अपने मित्र पूंजीपतियों का विकास आगे बढ़ने के लिए धन मुहैय्या कराया। 2020-21 के दौरान, लाखों उपभोक्ताओं ने, केंद्र सरकार को ईंधन टैक्स के रूप में 4,55,069 करोड़ रुपये का भुगतान किया। लेकिन मोदी जी ने कॉर्पोरेट के मुनाफे पर लगने वाले टैक्स की दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया और नए निवेश के लिए यह दर उदारता पूर्वक कम करते हुए मात्र 15 प्रतिशत कर दिया। इस बीच न विकास तेज़ हुआ न बेरोज़गारी कम हुई, लेकिन बड़ी कंपनियां/ बड़े व्यापारी, छोटे और मध्यम क्षेत्र के व्यापारियों की बर्बादी का लाभ उठाते हुए, कीमतें बढाने में कामयाब रहे। और शेयर बाज़ार झूमता रहा तथा सत्ताधारी भाजपाई खुश होते रहे।
गुजरात की हम बात करे तो गुजरातमें 3.6 लाख रजिस्टर्ड बेरोजगार है, जिसमे 90% से अधिक लोग पढ़े लिखे श्रेणी के है| गुजरात में 20-24 वर्ष के युवाओ की बेरोजगारी दर 12.49 % है, जिसमे अगर हम सिर्फ युवा महिलाओ की बात करे तो यह दर बढ़ कर 27% हो जाती है| मोदी जी के बनाये इस गुजरात में जहाँ आर्थिक विकास दर 9.19% है तो वही ऋण वृध्धि दर 11.49% है| गुजरात राज्य पर मार्च 2022 के अंत तक ऋण बढ़ कर 4 लाख करोड़ की राशी पार कर चूका है जोकी पिछले 15 वर्षो की तुलना में 3 गुना वृध्धि है| आज गुजरात के हर व्यक्ति के सर पर 65000 रु का कर्जा है| इस आर्थिक विषम परिस्थिति में सन 2021 में गुजरात के 3332 मजदूरो- किशानो ने आत्महत्या की अर्थात औसतन हर दिन 9 लोगो ने आत्महत्या की | 2015 से 2021 के बिच बेंको में 6 लाख करोड़ की जालसाजी हुई | बेंको की लोन रिकवरी रेट भाजपा सरकार में 0.7% रह गई, जब की कोंग्रेस सरकार में यह 23.7% थी| आज गरीब आत्महत्या कर रहा है और अमीर पैसा लेके भाग रहा है| मोरबी की घटना तो भ्रष्टाचार के काले खेल का प्रत्येक्ष उदहारण है| जहा घडी बनाने वाली कंपनी को पुल की मरामत का ठेका दे दिया गया मोरबी में हुई सेकड़ो मोतो की जिम्मेदारी भाजपा की भ्रष्ट सरकार के कंधो पर है|
ऐसे में मोदी सरकार की धृष्टता देखिए कि गरीब को 5 किलो राशन दिए जाने पर वो ‘धन्यवाद’ की आकांक्षा रखती है। पर क्या मोदी सरकार यह जनता को बताएगी कि 5 वर्षों में भ्रष्ट धनपशुओं का 10 लाख करोड़ तक का लोन माफ हुआ है। इस ‘मुफ्त की रेवड़ी’ लेने वालों में मेहुल चोकसी और ऋषि अग्रवाल का नाम शीर्ष पर है। सरकारी खजाने पर आखिर पहला हक किसका है- इन बईमानों का या आम जनता का?
भारत में मौजूदा महंगाई और बेरोज़गारी मुख्यतः सरकारी निकम्मेपन का नतीजा है और उसी द्वारा संचालित हो रही है। दुनिया में पिछले कुछ समय से बढती कीमतों के बावजूद आज आम लोगों की पीड़ा कि मुख्य जिम्मेदारी विश्व की घटनाओं पर नहीं डाली जा सकती; यह मुख्य रूप से स्वयं भारत के शासकों कि जिम्मेवारी है, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को वर्तमान रसातल में पहुँचाया है।
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