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पत्रकारिता की दुनियां में अनेक ऐसे हस्ताक्षर है जिनको देखकर आप सीखने की लगन को जुनून में बदल सकते है। मेकियावली ने कहा था हर व्यक्ति अपने युग का शिशु होता है। जिस युग मे जन्म लेता है उस युग की परिस्थितियां उसे प्रभावित करती है। पत्रकारिता से परिचय के साथ साथ ही 1985 के काल मे दूरदर्शन पर चुनावी विश्लेषण के लिए दो किरदारों ने मोर्चा सम्हाला था। हिंदीभाषियों के लिए विनोद दुआ हुआ करते थे और अंग्रेजी भाषा केलिए प्रणव राय होते थे। आमतौर पर प्रसारण के लिए सरकार के तंत्र को सिर्फ सरकार के उजले पक्ष को परोसने का एक नियंत्रित संसाधन माना जाता है लेकिन इस मिथक से विनोद दुआ ने लोगो के मिथक को तोड़कर निष्पक्ष पत्रकारिता की नई चिंगारी जलाई थी क्योंकि कुछ सालों पहले ही देश ने व्यवस्थापिका ने कलम की निगहबानी पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। एक दौर में मनपसंद लिखवाना ही संस्कृति बन गई थी। बहरहाल विनोद दुआ ने दूरदर्शन पत्रकारिता की परिभाषा बदली। वे आक्रामकता के पैरवीकार थे। अच्छे अच्छे मंत्रियों, सांसदों को विनोद दुआ ने साहसिक रूप से जनता के समक्ष रखा। मुझे अच्छे से याद है कि माधवराव सिंधिया को उन्होंने हमारी सरकार कहने पर आपकी सरकार कह कर प्रतिप्रश्न किया तो सिंधिया जी भी हड़बड़ा गए थे। खत्म हुआ पत्रकारिता के जायके का सफर

05 Dec 2021 03:33AM,
by: Naveen kumar sahu