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आकाशवाणी, दूरदर्शन जैसे माध्यमो को सरकार के नियंत्रण में रहकर बोलने दिखाने के कार्यक्रम को अस्सी औऱ अब के दशक में देश देख सुन चुका था और अब फिर से देख सुन रहा हैं। अंग्रेजों के द्वारा विभाजन करो और राज करो का फार्मूला जिन्हें लगाना है वे सफल हो रहे है लेकिन दुख की बात है कि लोकतंत्र का चौथा खम्बा सत्तारूढ़ दलो के रंग में रंगते जा रहा है। इसका फायदा भले ही राजनैतिक दलों को मिल रहा है लेकिन नुकसान आम जनता को हो रहा है। किसी जमाने मे पत्रकारिता भी चिकित्सा के समान मानव सेवा हुआ करती थी। आम जनता के हित औऱ मनोरंजन के मुद्दे पाठकों को संतोष देते थे। जब किसी मिशन में व्यवसायिकता अपने पांव मजबूत करने लगती है तो निःस्वार्थ शब्द से निः विलोपित होने लगता है। चिकित्सा में व्यवसायीकरण ने अपना आधिपत्य जमा लिया है मानव सेवा की भावना अब कम हो गयी है । मल्टीप्लेक्स अस्पतालों के आने से चिकित्सा व्यवस्था अब शानदार व्यवसाय बन गया है। मरीज अब मुर्गे में बदल गया है।कितना काटा जा सकता है ये मायने रखता है। इलेक्ट्रॉनिक औऱ प्रिंट मीडिया का भी व्यवसायीकरण हो गया है। आजकल मीडिया हाउस हुआ करते है । ये समाज सेवा के लिए आये है ये कहना कठिन से हो चला है। जब हित मानव सेवा से परे जाकर लाभ हानि के बेलेंस शीट में परिवर्तित हो जाये तो स्वार्थ प्रथम हो जाता है। क्या कवि भी किसी मीडिया हाउस की संपत्ति होते है?

18 Dec 2021 06:03AM,
by: Naveen kumar sahu