Thaneshwar sahu

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छत्तीसगढ़ की बहुमूल्य धरोहर समृद्ध हाथकरघा के रूप में अभिव्यक्त हो रही है और अपनी विविधता, गुणवत्ता एवं सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। राजनांदगांव जिले के बुनकरों के हाथों के हुनर ने बेजोड़ कारीगरी से अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। शासन की पहल से विलुप्त हो रही छत्तीसगढ़ी परम्परागत लोधी बुनकारी कला को पुनर्जीवन मिला है। छुईखदान एवं गंडई के बुनकर मोहक डिजाइन के लोधी साड़ी का निर्माण कर रहे हैं, जिसकी अभी मार्केट में अच्छी डिमांड है। लोधी साड़ी को बड़ेभौराई साड़ी भी कहा जाता है। जिसमें खाप का प्रयोग करते हुए सिंघोलिया बूटी, मेयूर बूटी एवं डमरू की डिजाइन बनी हुई है, साथ ही पंचोलिया एवं प्रताप पर डिजाइन से सुसज्जित किया गया है। यह साड़ी शादी-विवाह के अवसर पर बहुतायत उपयोग किया जाता है। छुईखदान बुनकर सहकारी समिति मर्यादित के तहत निर्मित हाथकरघा उत्पाद फेब इंडिया नई दिल्ली में निर्यात किये जा रहे हैं। अनोखे रंग संयोजन से बने उम्दा फेब्रिक लोगों की पसंद बन रही है। इस वर्ष 150 बुनकरों को 70 लाख 64 हजार राशि की प्राप्त हुई है, जिनसे उनकी आर्थिक स्थिति सशक्त हुई है। शासन द्वारा बेडशीट एवं गणवेश के लिए वस्त्र क्रय किया गया है, वहीं कोरोना संक्रमण के बावजूद 10 लाख वस्त्र तैयार किए गए हैं, जो फेब इंडिया को भेजे जा रहे हैं। वहीं वस्त्रों का शासकीय कार्यों के लिए सप्लाई किया गया है। विलुप्त हो रही लोधी साड़ी बुनकारी कला को मिला पुनर्जीवन

22 Nov 2020 11:48AM,
by: Thaneshwar sahu