Vikash Kumar

Generic placeholder image

इस देश मे संस्कृत से देवनागरी लिपि के सफर में अनेकानेक भाषाओं ने लिखने बोलने की विधि का अविष्कार किया लेकिन तमाम भाषाओं की पछाड़ते हुए हिंदी ने अपना बहुमत बना ही लिया। यद्यपि देश के संविधान में देश की भाषा के मामले में संविधान विदों की बोलती बंद हो गयी थी - राष्ट्र भाषा के चयन में। अंग्रेजी को सीख विदेशी नकल की अंधभक्ति ने हमे गुलाम मानसिकता में जकड़ने सर्वश्रेष्ठ कार्य किया लेकिन हिंदी ने अपना वजूद बनाये रखा। हिंदी को हिंदी के कलमकारों ने एक तरफ सींच कर विराट बनाया तो हिंदी भाषी फिल्मो औऱ बाद में टेक्नालॉजी के बने 4 केंद्रों(पुणे,बंगलूरू, चैन्नई, हैदराबाद), में हिंदी भाषियों के बढ़ती जनसंख्या ने समीकरण बदल कर रख दिया है। आज देश मे समग्र 45 फिसदी आबादी याने 60 करोड़ लोग हिंदी पढ़ते बोलते है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ने देश मे भाषा की बेड़ियों को तोड़ते हुए लोगो को हिंदी से जुड़ने के लिए विवश किया। हिंदी को स्थापित और प्रतिष्ठित करने में हिंदी समाचार पत्रों के पत्रकारों के योगदान को आज याद करने का दिन है क्योंकि आज के ही दिन जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी के पहले समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड को कोलकाता में जन्म दिया था। अंग्रेजो के शासनकाल में जब कोलकाता देश की राजधानी हुआ करती थी। यहां से पारसी और आंग्ल भाषा मे समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे। जुगल किशोर शुक्ल जो मूलतः उत्तरप्रदेश के रहनेवाले थे। उन्होंने जुगत लगाया और अपने सामर्थ्य का इम्तिहान खुद लिया। 30 मई 1826 को जब जुगलकिशोर जी ने पहला अंक निकाला तो लिखा " यह उदंत मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नही चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगला में जो समाचार पत्र कागज छपता है उनका सुख बोलियों को जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। बाकी लोग पराए सुख पर सुखी होते है जैसे पराए सेठ का धनी होना और अपने रहते पराई आंख से देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसका रस मिलना कठिन है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे है अब हिंदुस्तानी लोग देख ले । आप पढ़ ले समझ ले। पराई मि उपेक्षा न करे पर अपनी भाषा का मान न छोड़े।"

30 May 2021 08:38AM,
by: Vikash Kumar